Friday, May 22, 2026

Impromptu


जज़्बात के हैं ये हालात.. कोई मुलाक़ात नहीं है

हर किसी में है कुछ बात... पर कोई बात नहीं है

Monday, May 18, 2026

Impromptu

 सबके अपने अपने रास्ते सबके अपने अपने ठिकाने

कुछ मंजिल पे पहुंचे कुछ अब भी हैं मुसाफिर पुराने

ज़िन्दगी की किताब में हर किसी के अलग अलग हैं फसाने

सफर में कुछ दूर चलकर क्यों खो जाते हैं जाने पहचाने



Friday, April 10, 2026

Impromptu

 वो आ पहुंचे यकबयक बिन बताए हुए

मानो गुजरे दिन लौट आए बिन बुलाए हुए


बचपन से मिलके किसे खुशी नहीं होती

नहीं होती तो  बस ये दूरी तय नहीं होती


क्या हुआ कि दो पल भी वो बैठ न पाए

चंद लम्हे ही बहुत हैं दूरियों को भुलाए हुए

Tuesday, April 7, 2026

Impromptu




कभी कभी खैरो खबर भी जरूरी होती है

कभी जीकर कभी फिकर भी जरूरी होती है

माना फासले , दूरी, कभी कुछ मजबूरी होती है

दुआ सलामती में भी दूरी कुछ तो पूरी होती है



Impromptu

 माना सूरज कुछ नाराज़ है

बसंत ऋतु का आगाज़ है

बस कुछ दिन की बात है

फिर सूरज का ही राज है 

Impromptu



दूर कहीं गांव में इक आशियां हो प्रकृति की छांव में

कुछ सोंधी कुछ गीली कुछ कच्ची मिटटी हो पांव में..


Impromptu



हर दिल में धंसा है तीर कोई

हर पांव में है जंजीर कोई

कौन बदल पाया तकदीर को

जब कमबख्त तकदीर ही है सोई

Impromptu