जज़्बात के हैं ये हालात.. कोई मुलाक़ात नहीं है
हर किसी में है कुछ बात... पर कोई बात नहीं है
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सबके अपने अपने रास्ते सबके अपने अपने ठिकाने
कुछ मंजिल पे पहुंचे कुछ अब भी हैं मुसाफिर पुराने
ज़िन्दगी की किताब में हर किसी के अलग अलग हैं फसाने
सफर में कुछ दूर चलकर क्यों खो जाते हैं जाने पहचाने
वो आ पहुंचे यकबयक बिन बताए हुए
मानो गुजरे दिन लौट आए बिन बुलाए हुए
बचपन से मिलके किसे खुशी नहीं होती
नहीं होती तो बस ये दूरी तय नहीं होती
क्या हुआ कि दो पल भी वो बैठ न पाए
चंद लम्हे ही बहुत हैं दूरियों को भुलाए हुए
कभी कभी खैरो खबर भी जरूरी होती है
कभी जीकर कभी फिकर भी जरूरी होती है
माना फासले , दूरी, कभी कुछ मजबूरी होती है
दुआ सलामती में भी दूरी कुछ तो पूरी होती है
दूर कहीं गांव में इक आशियां हो प्रकृति की छांव में
कुछ सोंधी कुछ गीली कुछ कच्ची मिटटी हो पांव में..
हर दिल में धंसा है तीर कोई
हर पांव में है जंजीर कोई
कौन बदल पाया तकदीर को
जब कमबख्त तकदीर ही है सोई