Friday, April 10, 2026

Impromptu

 वो आ पहुंचे यकबयक बिन बताए हुए

मानो गुजरे दिन लौट आए बिन बुलाए हुए


बचपन से मिलके किसे खुशी नहीं होती

नहीं होती तो  बस ये दूरी तय नहीं होती


क्या हुआ कि दो पल भी वो बैठ न पाए

चंद लम्हे ही बहुत हैं दूरियों को भुलाए हुए

No comments:

Post a Comment

Impromptu