कुछ कही भी न जाए, कुछ सही भी न जाए
ज़िंदगी कुछ इस तरह चुपचाप ही बही जाए
न आँसू खुलकर गिरें, न हँसी लौट पाए
हर एहसास दिल में क्यों दबा दबा ही रह जाए
रिश्ते पास हों कर भी क्यों दूर रह जाएं
भीड़ में रह कर भी अकेला खुद को पाए
दिन जगे हर शख्स बोझ ढोता नजर आए
रात आए तो आंखों में क्यों नींद ठहर न पाए
कोई कुछ तो समझाए क्या हम समझ न पाए
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