Tuesday, April 7, 2026

Impromptu




कभी कभी खैरो खबर भी जरूरी होती है

कभी जीकर कभी फिकर भी जरूरी होती है

माना फासले , दूरी, कभी कुछ मजबूरी होती है

दुआ सलामती में भी दूरी कुछ तो पूरी होती है



Impromptu

 माना सूरज कुछ नाराज़ है

बसंत ऋतु का आगाज़ है

बस कुछ दिन की बात है

फिर सूरज का ही राज है 

Impromptu



दूर कहीं गांव में इक आशियां हो प्रकृति की छांव में

कुछ सोंधी कुछ गीली कुछ कच्ची मिटटी हो पांव में..


Impromptu



हर दिल में धंसा है तीर कोई

हर पांव में है जंजीर कोई

कौन बदल पाया तकदीर को

जब कमबख्त तकदीर ही है सोई

Impromptu

 जा बिछड़ जा , तेरा जमाल रहे,

ना ख्वाबों में आना, ये ख्याल रहे

ना कोई मलाल, ना कोई सवाल रहे

वक्त ने किया क्या हसीन सितम a new touch


वक्त ने किया क्या हसीन सितम

हम रहे न हम तुम रहे न तुम


वो जो कहते थे ना बिछड़ेंगे हम

आज हो गए किसी और के सनम

वक्त ने किया क्या हसीन सितम ...


छीन के ले जाए किसमे था वो दम

वो खुद ही चले गए बस यही है गम..

वक्त ने किया क्या हसीन सितम

Impromptu



शिकायतें भी वो  कुछ शरारत भरी करते हैं 

दिल तोड़ने की अदा मुस्कराहट भरी रखते है


Impromptu