यादों की डायरी कुछ यूँ सजा डाली है
लम्हों और यादों की लड़ी बना डाली है
हर पन्ने पर एक मुस्कान बिठा रखी है
हर कोने में एक दास्ताँ छुपा रखी है
कुछ पल हँसी के कुछ आँखों की नमी के
कुछ रंग बचपन के कुछ किस्से ज़िंदगी के
न तारीख़ों का हिसाब न सालों की गिनती है
बस दिल को जो छू गए उन्हीं की बस्ती है
जब भी तन्हा दिल गुज़रे कल को बुलाता है
यादों का कोई पन्ना खुदबखुद खुल जाता है
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